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वन पर्व
अध्याय १६३
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अर्जुन उवाच
ऊर्ध्ववाहुश्चतुर्थं तु मासमस्मि स्थितस्तदा |  १६   क
न च मे हीय़ते प्राणस्तदद्भुतमिवाभवत् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति