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वन पर्व
अध्याय १६३
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अर्जुन उवाच
चतुर्थे समभिक्रान्ते प्रथमे दिवसे गते |  १७   क
वराहसंस्थितं भूतं मत्समीपमुपागमत् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति