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शान्ति पर्व
अध्याय १८४
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भरद्वाज उवाच
किं कस्य धर्मचरणं किं वा धर्मस्य लक्षणम् |  ५   क
धर्मः कतिविधो वापि तद्भवान्वक्तुमर्हति ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति