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वन पर्व
अध्याय १६३
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अर्जुन उवाच
निघ्नन्प्रोथेन पृथिवीं विलिखंश्चरणैरपि |  १८   क
संमार्जञ्जठरेणोर्वीं विवर्तंश्च मुहुर्मुहुः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति