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वन पर्व
अध्याय १६३
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वैशम्पाय़न उवाच
अभिवादय़मानं तु मूर्ध्न्युपाघ्राय़ पाण्डवम् |  २   क
हर्षगद्गदय़ा वाचा प्रहृष्टोऽर्जुनमव्रवीत् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति