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वन पर्व
अध्याय १६३
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अर्जुन उवाच
युगपत्तत्किरातश्च विकृष्य वलवद्धनुः |  २१   क
अभ्याजघ्ने दृढतरं कम्पय़न्निव मे मनः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति