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वन पर्व
अध्याय १६३
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अर्जुन उवाच
एष ते निशितैर्वाणैर्दर्पं हन्मि स्थिरो भव |  २३   क
स वर्ष्मवान्महाकाय़स्ततो मामभ्यधावत ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति