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वन पर्व
अध्याय १६३
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अर्जुन उवाच
ततो गिरिमिवात्यर्थमावृणोन्मां महाशरैः |  २४   क
तं चाहं शरवर्षेण महता समवाकिरम् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति