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वन पर्व
अध्याय १६३
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अर्जुन उवाच
अणुर्वृहच्छिरा भूत्वा वृहच्चाणुशिराः पुनः |  २८   क
एकीभूतस्तदा राजन्सोऽभ्यवर्तत मां युधि ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति