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वन पर्व
अध्याय १६३
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अर्जुन उवाच
यदाभिभवितुं वाणैर्नैव शक्नोमि तं रणे |  २९   क
ततोऽहमस्त्रमातिष्ठं वाय़व्यं भरतर्षभ ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति