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वन पर्व
अध्याय १६३
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अर्जुन उवाच
ततः सन्तापितो लोको मत्प्रसूतेन तेजसा |  ३४   क
क्षणेन हि दिशः खं च सर्वतोऽभिविदीपितम् ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति