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वन पर्व
अध्याय १६३
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अर्जुन उवाच
व्याय़ामं मुष्टिभिः कृत्वा तलैरपि समाहतौ |  ३८   क
अपातय़च्च तद्भूतं निश्चेष्टो ह्यगमं महीम् ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति