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वन पर्व
अध्याय १६३
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अर्जुन उवाच
हित्वा किरातरूपं च भगवांस्त्रिदशेश्वरः |  ४१   क
स्वरूपं दिव्यमास्थाय़ तस्थौ तत्र महेश्वरः ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति