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वन पर्व
अध्याय १६३
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अर्जुन उवाच
अदृश्यत ततः साक्षाद्भगवान्गोवृषध्वजः |  ४२   क
उमासहाय़ो हरिदृग्वहुरूपः पिनाकधृक् ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति