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वन पर्व
अध्याय १६३
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अर्जुन उवाच
तुष्टोऽस्मि तव कौन्तेय़ व्रूहि किं करवाणि ते |  ४५   क
यत्ते मनोगतं वीर तद्व्रूहि वितराम्यहम् |  ४५   ख
अमरत्वमपाहाय़ व्रूहि यत्ते मनोगतम् ||  ४५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति