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वन पर्व
अध्याय १६३
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अर्जुन उवाच
रौद्रमस्त्रं मदीय़ं त्वामुपस्थास्यति पाण्डव |  ४८   क
प्रददौ च मम प्रीतः सोऽस्त्रं पाशुपतं प्रभुः ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति