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वन पर्व
अध्याय १६३
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वैशम्पाय़न उवाच
यथा दृष्टश्च ते शक्रो भगवान्वा पिनाकधृक् |  ५   क
यथा चास्त्राण्यवाप्तानि यथा चाराधितश्च ते ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति