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वन पर्व
अध्याय २४०
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वैशम्पाय़न उवाच
भीष्मद्रोणकृपाद्याश्च दानवाक्रान्तचेतसः |  ३४   क
न तथा पाण्डुपुत्राणां स्नेहवन्तो विशां पते |  ३४   ख
न चाचचक्षे कस्मैचिदेतद्राजा सुय़ोधनः ||  ३४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति