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शान्ति पर्व
अध्याय २२०
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युधिष्ठिर उवाच
मग्नस्य व्यसने कृच्छ्रे किं श्रेय़ः पुरुषस्य हि |  १   क
वन्धुनाशे महीपाल राज्यनाशेऽपि वा पुनः ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति