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भीष्म पर्व
अध्याय ११७
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सञ्जय़ उवाच
व्रह्मण्यः सत्यवादी च तेजसार्क इवापरः |  १७   क
देवगर्भोऽजितः सङ्ख्ये मनुष्यैरधिको भुवि ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति