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द्रोण पर्व
अध्याय १६३
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सञ्जय़ उवाच
तौ वृषाविव सङ्क्रुद्धौ विवृत्तनय़नावुभौ |  १२   क
वेगेन महतान्योन्यं संरव्धावभिपेततुः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति