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आदि पर्व
अध्याय १०४
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वैशम्पाय़न उवाच
यस्मिन्काले जपन्नास्ते स वीरः सत्यसङ्गरः |  १७   क
नादेय़ं व्राह्मणेष्वासीत्तस्मिन्काले महात्मनः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति