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द्रोण पर्व
अध्याय १६३
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सञ्जय़ उवाच
तदप्सरोभिराकीर्णं यक्षराक्षससङ्कुलम् |  ३५   क
श्रीमदाकाशमभवद्भूय़ो मेघाकुलं यथा ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति