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द्रोण पर्व
अध्याय १६३
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सञ्जय़ उवाच
इत्यव्रुवन्महाराज दृष्ट्वा तौ पुरुषर्षभौ |  ४२   क
अन्तर्हितानि भूतानि प्रकाशानि च सङ्घशः ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति