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द्रोण पर्व
अध्याय १६३
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सञ्जय़ उवाच
शरजालैः समाकीर्णे मेघजालैरिवाम्वरे |  ४९   क
न स्म सम्पतते कश्चिदन्तरिक्षचरस्तदा ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति