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द्रोण पर्व
अध्याय १६३
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सञ्जय़ उवाच
स हय़ान्संनिगृह्याजौ स्वय़ं हय़विशारदः |  ५   क
युय़ुधे रथिनां श्रेष्ठश्चित्रं लघु च सुष्ठु च ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति