द्रोण पर्व  अध्याय १६३

सञ्जय़ उवाच

स रश्मिषु विषक्तत्वादुत्ससर्ज शरासनम् |  ८   क
धनुषा कर्म कुर्वंस्तु रश्मीन्स पुनरुत्सृजत् ||  ८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति