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वन पर्व
अध्याय ८०
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पुलस्त्य उवाच
अहं पूर्वमहं पूर्वं द्रक्ष्यामि वृषभध्वजम् |  १२५   क
एवं सम्प्रस्थिता राजन्नृषय़ः किल भारत ||  १२५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति