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वन पर्व
अध्याय २०७
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मार्कण्डेय़ उवाच
यथा च भगवानग्निः स्वय़मेवाङ्गिराभवत् |  ७   क
सन्तापय़न्स्वप्रभय़ा नाशय़ंस्तिमिराणि च ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति