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वन पर्व
अध्याय २४१
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वैशम्पाय़न उवाच
एवमुक्तस्तु कर्णेन कर्णं राजाव्रवीत्पुनः |  १७   क
न किञ्चिद्दुर्लभं तस्य यस्य त्वं पुरुषर्षभ ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति