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वन पर्व
अध्याय १६४
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अर्जुन उवाच
त्वय़ा हि तीर्थेषु पुरा समाप्लावः कृतोऽसकृत् |  २१   क
तपश्चेदं पुरा तप्तं स्वर्गं गन्तासि पाण्डव ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति