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वन पर्व
अध्याय १६४
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अर्जुन उवाच
मातलिर्मन्निय़ोगात्त्वां त्रिदिवं प्रापय़िष्यति |  २३   क
विदितस्त्वं हि देवानामृषीणां च महात्मनाम् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति