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शल्य पर्व
अध्याय २७
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सञ्जय़ उवाच
प्रत्याश्वस्य च दुर्धर्षः सहदेवो विशां पते |  २४   क
शकुनिं दशभिर्विद्ध्वा हय़ांश्चास्य त्रिभिः शरैः |  २४   ख
धनुश्चिच्छेद च शरैः सौवलस्य हसन्निव ||  २४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति