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वन पर्व
अध्याय १६४
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अर्जुन उवाच
लोकपालेषु यातेषु मामुवाचाथ मातलिः |  ३२   क
द्रष्टुमिच्छति शक्रस्त्वां देवराजो महाद्युते ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति