वन पर्व  अध्याय १६४

अर्जुन उवाच

इत्युक्तोऽहं मातलिना गिरिमामन्त्र्य शैशिरम् |  ३४   क
प्रदक्षिणमुपावृत्य समारोहं रथोत्तमम् ||  ३४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति