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वन पर्व
अध्याय १६४
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अर्जुन उवाच
अवैक्षत च मे वक्त्रं स्थितस्याथ स सारथिः |  ३६   क
तथा भ्रान्ते रथे राजन्विस्मितश्चेदमव्रवीत् ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति