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वन पर्व
अध्याय १६४
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अर्जुन उवाच
त्वं पुनः स्थित एवात्र रथे भ्रान्ते कुरूद्वह |  ३९   क
अतिशक्रमिदं सत्त्वं तवेति प्रतिभाति मे ||  ३९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति