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वन पर्व
अध्याय १६४
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अर्जुन उवाच
न तत्र शोको दैन्यं वा वैवर्ण्यं चोपलक्ष्यते |  ४४   क
दिवौकसां महाराज न च ग्लानिररिन्दम ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति