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वन पर्व
अध्याय १६४
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अर्जुन उवाच
न क्रोधलोभौ तत्रास्तामशुभं च विशां पते |  ४५   क
नित्यतुष्टाश्च हृष्टाश्च प्राणिनः सुरवेश्मनि ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति