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सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
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सञ्जय़ उवाच
सहस्रचन्द्रं विपुलं गृहीत्वा चर्म संय़ुगे |  ४९   क
खड्गं च विपुलं दिव्यं जातरूपपरिष्कृतम् |  ४९   ख
द्रौपदेय़ानभिद्रुत्य खड्गेन व्यचरद्वली ||  ४९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति