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वन पर्व
अध्याय १६४
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अर्जुन उवाच
शीतस्तत्र ववौ वाय़ुः सुगन्धो जीवनः शुचिः |  ४७   क
सर्वरत्नविचित्रा च भूमिः पुष्पविभूषिता ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति