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कर्ण पर्व
अध्याय ५३
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सञ्जय़ उवाच
सुषेणशीर्षं पतितं पृथिव्यां; विलोक्य कर्णोऽथ तदार्तरूपः |  ११   क
क्रोधाद्धय़ांस्तस्य रथं ध्वजं च; वाणैः सुधारैर्निशितैर्न्यकृन्तत् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति