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वन पर्व
अध्याय १६४
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अर्जुन उवाच
समेत्य लोकपालैस्तु सर्वैर्वैवस्वतादिभिः |  ५   क
द्रष्टास्यनघ देवेन्द्रं स च तेऽस्त्राणि दास्यति ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति