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वन पर्व
अध्याय १६४
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अर्जुन उवाच
ददावर्धासनं प्रीतः शक्रो मे ददतां वरः |  ५२   क
वहुमानाच्च गात्राणि पस्पर्श मम वासवः ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति