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वन पर्व
अध्याय १६४
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अर्जुन उवाच
वादित्राणि च दिव्यानि सुघोषाणि समन्ततः |  ९   क
स्तुतय़श्चेन्द्रसंय़ुक्ता अश्रूय़न्त मनोहराः ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति