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आदि पर्व
अध्याय ६०
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वैशम्पाय़न उवाच
नव क्रोधवशा नारीः प्रजज्ञेऽप्यात्मसम्भवाः |  ५८   क
मृगीं च मृगमन्दां च हरिं भद्रमनामपि ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति