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द्रोण पर्व
अध्याय १२४
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सञ्जय़ उवाच
त्वत्प्रसादाद्धृषीकेश जगत्स्थावरजङ्गमम् |  १२   क
स्ववर्त्मनि स्थितं वीर जपहोमेषु वर्तते ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति