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वन पर्व
अध्याय १७०
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अर्जुन उवाच
सुरासुरैरवध्यांस्तानहं ज्ञात्वा ततः प्रभो |  १३   क
अव्रुवं मातलिं हृष्टो याह्येतत्पुरमञ्जसा ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति