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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
आस्येनानुप्रविष्टोऽहं शरीरं भगवंस्तव |  १२३   क
दृष्टवानखिलाँल्लोकान्समस्ताञ्जठरे तव ||  १२३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति