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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
तं दृष्ट्वा परमोद्विग्नं शोकोपहतचेतसम् |  १११   क
पाञ्चालराजस्य सुतो धृष्टद्युम्नः समाद्रवत् ||  १११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति