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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
स धनुर्जैत्रमादाय़ घोरं जलदनिस्वनम् |  ११३   क
दृढज्यमजरं दिव्यं शरांश्चाशीविषोपमान् ||  ११३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति